भारत का यूएन में फ़लस्तीन समर्थन: क्या बदल रही है विदेश नीति?

सुरेन्द्र दुबे ,राजनैतिक विश्लेषक
सुरेन्द्र दुबे ,राजनैतिक विश्लेषक

13 सितंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में फ़लस्तीन को अलग और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने के प्रस्ताव पर मतदान हुआ। इस प्रस्ताव को 193 में से 142 देशों ने समर्थन दिया।

इस समर्थन में भारत के साथ शामिल थे- चीन, रूस, फ्रांस, यूके, जर्मनी, सऊदी अरब, क़तर, इटली, यूक्रेन जैसे प्रभावशाली देश।

वहीं अमेरिका और इसराइल समेत सिर्फ़ 10 देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। 12 देश वोटिंग से अनुपस्थित रहे।

भारत का स्टैंड: “हम दो राष्ट्र समाधान के साथ हैं”

भारत ने साफ़ कहा है कि वह हमेशा से इसराइल और फ़लस्तीन के बीच “Two-State Solution” का समर्थन करता आया है।

भारत के यूएन प्रतिनिधि पर्वतानेनी हरीश ने कहा, “हम चाहते हैं कि इसराइल और फ़लस्तीन, दोनों शांतिपूर्वक, मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर सह-अस्तित्व में रहें।”

यह स्टैंड बिल्कुल नया नहीं है, बल्कि 1974 से चली आ रही भारत की विदेश नीति का ही हिस्सा है — जब भारत फ़लस्तीन मुक्ति संगठन को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना था।

न्यूयॉर्क घोषणापत्र क्या है?

इस प्रस्ताव को “New York Declaration” नाम दिया गया है और इसमें कई महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं – फ़लस्तीन को संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र मान्यता देने की दिशा में “Irreversible Step” उठाना। हमास को ग़ज़ा के भविष्य से बाहर रखने की मांग। इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान निकालना। ग़ज़ा में युद्ध रोकने और मानवीय सहायता बहाल करने पर ज़ोर।

नेतन्याहू का सख़्त बयान: “फ़लस्तीनी राष्ट्र कभी नहीं बनेगा”

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस प्रस्ताव से ठीक पहले कहा था – “फ़लस्तीनी राष्ट्र कभी नहीं बनेगा, ये ज़मीन हमारी है।”

उन्होंने वेस्ट बैंक में यह बयान दिया जहां उन्होंने एक विवादित बस्ती विस्तार योजना पर हस्ताक्षर भी किए। इस बयान के बाद ही यूएन में हुए मतदान को और ज़्यादा अहम माना जा रहा है।

भारत की फ़लस्तीन नीति: समर्थन की लंबी परंपरा

भारत का फ़लस्तीन के साथ संबंध सिर्फ़ वोटिंग तक सीमित नहीं है। देखें कुछ प्रमुख घटनाएं:

  • 1988: भारत ने फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता दी।

  • 2003: ग़ज़ा से रामल्ला में भारतीय प्रतिनिधि कार्यालय स्थानांतरित हुआ।

  • 2012: भारत ने UN में फ़लस्तीन को ‘नॉन-मेंबर ऑब्जर्वर स्टेट’ का दर्जा दिए जाने का समर्थन किया।

  • 2018: नरेंद्र मोदी फ़लस्तीन का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।

मोदी ने तब कहा था:

“भारत फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों और एक स्वतंत्र राज्य की उम्मीद के साथ पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”

लेकिन इसराइल से भी हैं मज़बूत रिश्ते

भारत-इसराइल रिश्ते भी गहरे हैं, ख़ासकर डिफेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटेलिजेंस के क्षेत्र में। दोनों देशों के बीच- नियमित सैन्य एक्सचेंज होते हैं। भारत इसराइल से अत्याधुनिक रक्षा तकनीक आयात करता है। 2018 में नेतन्याहू और मोदी की दोस्ती की तस्वीरें काफ़ी वायरल हुई थीं।

ऐसे में भारत का संतुलन बनाए रखना — एक ओर फ़लस्तीन को समर्थन और दूसरी ओर इसराइल से मज़बूत संबंध — कूटनीतिक समझदारी का नमूना है।

विपक्ष के सवाल और सरकार की सफाई

UN में भारत के वोट को लेकर विपक्ष ने पहले भी सवाल उठाए हैं, ख़ासकर जब भारत कुछ प्रस्तावों से दूरी बना चुका है — जैसे- जून 2025: ग़ज़ा युद्धविराम प्रस्ताव पर भारत अनुपस्थित, जनवरी 2023: क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाक़ों में मानवाधिकार हनन पर वोटिंग से दूरी। अक्टूबर 2023: भारत ने ग़ज़ा युद्धविराम प्रस्ताव का समर्थन किया। हर बार भारत ने दोहराया है कि उसका स्टैंड “दो राष्ट्र समाधान और बातचीत के ज़रिए हल” पर टिका है।

भारत का संतुलन — भावनाओं और रणनीति के बीच

भारत का यूएन में फ़लस्तीन के पक्ष में वोट देना एक मज़बूत राजनीतिक संदेश है, ख़ासकर ऐसे वक़्त में जब वैश्विक तनाव चरम पर है।

एक तरफ़ भारत फ़लस्तीन को उसकी पहचान और न्याय दिलाने के पक्ष में है। दूसरी तरफ़ इसराइल से रणनीतिक और तकनीकी संबंध बनाए रख रहा है। यह कूटनीति का वो मॉडल है जिसमें भावना, इतिहास और रणनीति — तीनों का संतुलन है।

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